Sunday, 30 September 2012

वक़्त नही हुआ है कुछ ज्यादा ,,,,,
हमने रंगा था जमीं के चिर को ,,,,
आज फिर जमीं सफ़ेद हो रही है ,,,
भगत सिंह बेनीवाल
हम -तुम जरा सा भी ,,,,,,,,,,,
देश के लिए सोचते ,,,,,,,,,,,,
ये चम्मचे और दलाल ,,,,,,,,
इस वतन को न नोचते ,,,,,,
भगत सिंह बेनीवाल
मत रह उसके भरोसे
खुद के सलिखों से
जीना सीख ले,,,,,,,,,,
उसने अभी तक
खुद को नही पहचाना है
तुम्हे क्या यकीं की
उसने आपको पहचान लिया है ,,,,!!!
भगत सिंह बेनीवाल
वो उनके साथ है या हमारे साथ है
मुझे शक है उसके इरादों पे ,,,,,,,,,,,,,
आये तो कैसे आये मैदान-ए- जंग मे
बुरा मत मानना मेरे दोस्त ,,,,,,,,,,
ऐसा पहले भी हो चूका है हमारे साथ ,,!!
भगत सिंह बेनीवाल
संजोता हूँ सपने
वतन की राहें
देखकर ,,,
बढ़ जाता हूँ
उन राहों में ,,,,,
वापीस लोट
आता हूँ ,,,
ये धूमिल राहें
देखकर ,,,,,,,!!!
भगत सिंह बेनीवाल
जिंदगी निगाहों से नही जीयी जाती है
क़दमों को बढ़ाना ही पङता है,,,,,,,,
भगत सिंह बेनीवाल
कभी भी जरुरत से ज्यादा मत सोचना ,,,,,,,
वास्तविक जीवन के मायने भूल जाओगे ,,,
भगत सिंह बेनीवाल
जख्म दिए है तुने ,,,
जख्मों से गिला नही है ,,,
जख्म सहे है बहुत मैंने ,,!!
मत कर कोशिश ऐ दोस्त ,,,
महरम लगाने की ,,,
मुझे महरम से दर्द होता है ,,,,,!!!
भगत सिंह बेनीवाल
बडो. का त्याग नवयुवकों के लिए एक ओषधि है ,,,,,

भगत

Saturday, 29 September 2012

मोम के चहरे

जीते जी बना दिए है मोम के चहरे यहाँ -वहां ,,,,
भीड. जमती है हर तरफ वाह -वाह की आवाज़ आती है ,,,,,
मन ही मन मंद-मंद मुस्कुराते है जिनकी वजह से बने है ये चहरे ,,,,
उनकी यादों में आज सनाटे है हमे याद वो क्यों नही आते है ,,,,,
भगत सिंह बेनीवाल

मेरी कुछ पंक्तिया भगत सिंह को समर्पित


जब लिखे थे आपने ,,,
अपने जज्बात और इरादे ,,,,
अपनों के जख्मों का दर्द ,,,
और पीडा. उन हालातों में ,,,,,
उन सुनहरे पन्नो में ,,,,
आज भी महक आ रही है ,,,
उस स्याही और पन्नो में ,,,
दिल खिल उठता है,,,,
आँखों में सेलाब उठता है ,,,,
हर शब्द ,लाइन पहरा बोलता है ,,,
और तस्वीर आपकी ही ,,,,,
नजरों में नजर आती है ,,,,
इन पन्नो को छिपाने की ,,,,
लाखों कोशिशें उनकी नाकाम जाती है ,,,
आज का खून जमा हुआ नजर आता है ,,,,
तभी तो आज जाना पहचाना चेहरा ,,,,,,,
सीना भेद जाता है,,,,
फिर भी खून ये उबाल नही लाता है ,,,,
उनका साहस और बढ़ जाता है ,,,,,
होसला बुलन्द हो जाता है ,,,,,
हर दिन एक न्य ही खेल नजर आता है ,,,,,!!!

,,,,,,भगत सिंह बेनीवाल,,,,,,,

जवानी वतन के हवाले

दुःख बहतु ही हुआ है आज
दिल फुट -फुट कर रोया है आज
आँखों में सेलाब आया है आज
हँसते-हँसते कर दी थी
जवानी वतन के हवाले
उनका नाम किसी की जुबान पे
नही आया आज ,,,
भगत

जख्म और दर्द


ये आप नही जानते हो आज ,,
की अपने क्या होते है ,,,
उनके जख्म और दर्द ,,,
क्या होते है ,,,
बस हमने तो इतना जाना था ,,,
अपने क्या होते है ,,,
दर्द क्या जख्म क्या होते है,,,
इसी सोच को आगे बढ़ाते गये और ,,,
कारवा बनता गया ,,,,,,!!!
भगत सिंह बेनीवाल

हमे आदत है खून पसीने की खाने की


भुला देना चाहते है आज
उनके अमिट त्याग ,बलिदान
और सुंदर सी उन तस्वीरों को
आज वो जिनकी रगों में बसा है नमक
गोरे दरबारों का ,,,,,,
रखना चाहते है तीन ही चहरे
इस वतन में वो
गाँधी ,नेहरु इन्द्रा,,,,,,
ऐसा होने नही देंगे हम
हमने नमक वतन का खाया है
हमारी रगो में बसा है
नमक इस वतन का
जिसने भी नमक बनाया है
उसने खून और पसीना बहाया है
हमे आदत है खून पसीने की खाने की ,,,,,,!!!!
"जय हिंद जय भारत "
"इन्कलाब जिंदाबाद"

छुपे रुस्तम

""छुपे रुस्तम ""
आये है हम इस पवन धरा पर ,,,,,,
आपके लिए बहुत कुछ कर के जायेंगें ,,,
बद नसीबी इतनी है हमारी,,,,
कच्ची राहों से गुजर रही है ,,,,
किस्मत हमारी ,,,,,
कदम बढ़ नही रहे है ,,,,,
पूरा दम लगाने पर भी ,,,,
दुनियां से बेहतर करने का ,,,,
मादा रखते हैं हम भी ,,,,,
बस शर्त तुमसे ये है ,,,,
होंसला आपका चाहिए ,,,,
मेहनत होगी हमारी ,,,,,,!!!!
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भगत सिंह बेनीवाल