Monday, 22 October 2012

माँ -बाप की नजरें

जब हुकुमत
गेरों की
हमारे लफ्जों
में झलकने
लगती है
माँ -बाप की
नजरें
बेबस सी
नजर आने
लगती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Sunday, 21 October 2012

आदत

मुझे आदत किताबों से ज्यादा
चहरे पढने की है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।भगत ।

सरहद

सरहद के उस पार से...........
हर दिन नई आवाजें आती है ................
मेरे दरवाजे पे तो दस्तक दे जाती है ..................
रोम -रोम में समा जाती है ....................................
क्या उनके दरवाजे के आगे से ....................................
निकल जाती है ..............................................................!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

अँधा फरमान


कोई अँधा फरमान
सुना देता है ,,,,,,
किसी की कोख
किसी की मांग
सुनी कर जाता है
खुद गुफाओं में
समा जाता है
भाई -भाई के खून
से प्यास बुझाता
हुआ नजर आता है ,,,,,,,,,,,,,,!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

तन

उस तन को क्या भूख
सताएगी जिसको
तुमने सताया है
उसकी याद किसको
आएगी जिसको
तुमने भुलाया है
तुम उसे जीने की
कला क्या सिखाओगे
जिन्होंने दुनिया को
जीना सिखाया है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

नजरें

जब हुकुमत
गेरों की
हमारे लफ्जों
में झलकने
लगती है
माँ -बाप की
नजरें
बेबस सी
नजर आने
लगती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Saturday, 20 October 2012

अनचाहा सपना

वो अपनी याद नही दिलाते है
वो तो इक अनचाहा
सपना था
जिसे देख लिया हमे
जैसे -तैसे
वो क्या कर क्या
कह गये
इक प्यारी सी नजर को दो -चार
कर गये
नजरों में नजरें ही ऐसी

भर गये खुद को खुद से अलग
कर गये ,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

सफ़ेद शरीर

वो सफ़ेद शरीर
आज भी
नजर आते
आप तो
उनसे भी
गये _गुजरे
हुए नजर
आते है ,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

तन

उस तन को क्या भूख
सताएगी जिसको
तुमने सताया है
उसकी याद किसको
आएगी जिसको
तुमने भुलाया है
तुम उसे जीने की
कला क्या सिखाओगे
जिन्होंने दुनिया को
जीना सिखाया है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Friday, 19 October 2012

गर्म पानी

गर्म पानी से घाव नही जला करता है
चाँद की उतावली में सूरज छिपा नही करता है
ससुराल में दामाद नही पनपा करता है
ये हम नही इतिहास कहता है ,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

ये बीमारी

ना हमदर्दी
चाहिए
ना बेदर्दी
चाहिए
तन पे वर्दी
चाहिए
तन में जर्दी
चाहिए
सिर पे छतरी
चाहिए

ना हिस्सेदारी
चाहिए
ना रिश्तेदारी
चाहिए
हमने नही
चाहिए
ये बीमारी ,,,,,,,,!!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

बकती रहती

बक- बक बकती रहती
अगणित जुबानें
न रूकती है न थकती है
न जाने साथ लाये है
पिछली सदियों के
कितने अफ़साने ,,,,,
खुद को क्या करना है
मजहब की खातिर
क्या करना है ,,,,,,
या यहीं बक -बक करना है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Monday, 15 October 2012

खुद को कितना समझा लेते है

खुद को कितना समझा लेते है
आज हम उनके लिए
जब हम मिलते है उनको
ये बताने के लिए
आपकी ये पहेली
हमे मंजूर नही है
राग में राग मिलते हुए
नजर आते है,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जब बिखर जाता है समूह
उनसे मुलाकात होती है

आपकी उनसे उनको सही
ठहराते हुए नजर आते हो
आपकी पीठ थप थपाते है
है वो और गद -गद हो जाते है
उनकी झूठी सी
मुस्कान में खो जाते है
उनके वादे हमारे दिन के खोखले
सपने बन जाते है
और हम सपनों में खो जाते है
वो इतना कुछ देकर हमे
वापिस अपनी राहों पे
लोट जाते है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
हम खोजते है आपको
ये सोचकर की आप
है हमारे पीछे
तो हमे पीछे दूर -दूर तक पेड.
नजर आते है ,,,,,,,,,,
जब नजरें आगे देखती है
आप हमें उन दरबारों में
हमसे ही बात करते हुए नजर
आते है ,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Sunday, 14 October 2012

हम क्या है क्या थे

हम क्या है क्या थे
इस बात को हमारे
माता-पिता से बेहतर
कोई नही जानता है
हम क्या होंगे ये
हम खुद जानते है

बस यही हमारे
माता -पिता नही
जानते है ,,,,,,
इक अजनबी की
खातिर अपने
माता -पिता को भूल
जाते है उसके लिए
जान देने की जरुरत ही
नही है हम उससे जान
देने का वायदा कर जाते है
उनकी वजह से हम हर
चोराहे पर झुक जाते है
उनके लिए सुंदर -२
गुलदस्ते खरीदते रहते है
माता -पिता को कभी
भूल कर भी कोई
गुलदस्ता नही दिया
आज उसी माँ -बाप को
भूल गया जिसने तुम्हारे
लिए अपना सपना
भुला दिया ,,,,
तुने आज ये सिला दिया ,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।भगत सिंह बेनीवाल ।

छोटी सी मुलाकात

तुन आता है मेरा आँगन महक उठता है
आँखों का तप शांत हो जाता है
जो बेठी थी तेरी इक झलक के लिए
कानो का बहरा पन टूट जाता है
जुबान का गूंगापन चला जाता है,,,,,,,,,,,,,,
कसर नही रहती है मेरी तरफ से
वो ही चाहत वही आदत रहती है
क्या चल रहा है तेरे जहन में
ये मैं जान नही सकता
चहरे पर मेरी निगाहें नही है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मैं तो दिल से देख रहा हूँ
तुम चले जाते हो बस छोटी सी
मुलाकात के बाद
मैंने कभी ना सोचा था अब तक
बस तेरी ये छोटी सी मुलाकात
मुझे मजबूर कर देती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मैं सोचता रहता हूँ आँखे भरती रहती है
जो कभी करती भी तेरी झलक के लिए
तप किया करती थी खुद को कोसती है
सवाल तुमसे नही मुझसे करती है ,,,,,,,,,,,,,,,
क्यों किया मुझे तुमने मुझे मजबूर
की बैठ जा इन राहों में कोई है
मेरा अपना जो आएगा तू देखना
उस पल को ऐसा पल तुझे कभी
नजर नही आएगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरे कान भी पूछ रहे है मुझसे
की तुमने क्यों रोका हमे की
मत कुछ सुनना उसके आने से
पहले वो सुनाएगा आप कभी
ऐसा नही सुन पाओगे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरा मुख पूछ रहा है मुझसे की
क्यों रोका तुमने मुझे की कुछ भी मत
बोलना तुम उसके आने से पहले उसके
लिए जो भी बोलगा कभी भूल
नही पायेगा,,,,,,,,,,,,,,,
मुझे ये पता नही था मेरे दोस्त की ये
सब इक छोटी सी मुलाकात में ही ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

कागज

इकठठा करलोगे
दो-चार कागज
यहाँ पे ,,,,,,,
किसी को
गुमराह करके
उनका तो कुछ नही
होगा ,,,,
पन्नो में नाम
नही मिलेगा
आने वाली

पीढ़ी को ,,
रास्ता बदलेंगी
दुनिया इन कंगूरों
दो देखकर
पक्षीयों के घोसले
नजर आयेंगे
देख लेगा
अगर मिले समय
तो यहाँ आकर
पक्षी चाह्चाते
नजर आयेंगे ,,,
इकठठा करलोगे
दो-चार कागज
यहाँ पे ,,,,,,,
किसी को
गुमराह करके,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

बंद कमरों से

दो-चार मिल जाते है आज
खून -पसीना पी जाते है आज
कुछ ही पल में ,,,,,,
कैसी प्यास है ये
पीढियां बीत जाती है
उस खून -पसीने के लिए ,,,,,,,
जब साजिश सामने आती है
आँखें भीग जाती है ,,,,,,,,
हर दिन बंद कमरों से
खून पसीने की नदियाँ

बाहर आती है ,,,,,,,,
अगणित अरमानो को
बहा ले जाती है ,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Friday, 12 October 2012

माँ

माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ माँ

Thursday, 11 October 2012

आशियाने में

जितना जानो खुद को
उतना ही कम है
जो तुम कहते हो ना
वो क्या है हमारे सामने
ये मायने नही है
मेरे दोस्त
तुं तो ये देख की
तस्वीर कहाँ रखी है
तुम्हारी उसके आशियाने में !!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

छोटा सा कपडा.

कब तक तुम हमसे कहते रहोगे
सुनते हम कब तक रहेंगें
ये तो तुम भी जानते हो
हम तुमसे क्या चाहते है
बस नसीब हो जाये
आसानी से मुझे मेरे वतन में
मुझे दो वक्त की रोटी
छोटा सा कपडा. जिसे कफन कहते है ,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

देह का लहू

ऐ मेरे दोस्त मत दे
मेरा साथ जब तक
इस देह का लहू गर्म है
जो करने आया हूँ में
यहाँ तुम्हारी नजरों के
सामने खुद ही कर लूँगा
जब वो करेंगे मुझे विदा
करने की तेयारी
जिसे अपने कहता हूँ में
उस वक्त आ जाना

तुम मेरी विदाई में
हो सके तो कन्धा जरुर
दे देना मुझे तुम्हारा
ये सहारा बहुत दूर ले जायेगा ,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

राही ,,,,

संभल कर चलना राही ,,,,
अपनी मंजिल की और
कांटे तो डालता मिलेगा
हर कोई ,,,,,,
गुलाब डालता मिलेगा
कोई -कोई ,,,,
शोर मचाएगा तुम्हे देखकर
हर कोई ,,,,
कुछ कहता हुआ नजर आएगा
कोई -कोई ,,,

संभल कर चलना राही
अपनी मंजिल की और ,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

परिभाषाएं

जब जुबान काम नही आती है
वहां फिर हथियार उठते है
हथियार उठाते ही
युवा जोश को अनेको परिभाषाएं
दे दी जाती है ,,,,,,,,,,!!!!

गरीब की आवाज

गरीब की आवाज
कब तक वतन के
काम आएगी ,,,
पेट की नसें
सीकुड. जाएँगी
तो जुबान पे वतन
की बात कहाँ से आयगी
गरीब की जुबान से
जब वतन की आवाज़
लुप्त हो जाएगी

तो इतिहास बन जाएगी
बाद में बच्चों की स्कूल
की किताबों में
पढाई जाएगी
साजिश उनकी साकार
हो जाएगी गरीब अपनी
जिन्दगी समय से ही पहले
गुजार जायेगा और
वतन की बात अपनी देह
में साथ ले जायेगा और
फिर उसी बात के साथ
नई उम्मीद नई होगी
अब तक तो वो चले गए
होंगे मेरे वतन से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!!!

।।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

बेहूदा नाच

जब तक मेरे भाई -बहिने
पैसे की खातिर ये परदे पे
बेहूदा नाच दिखायेंगे
मेरे देश के युवा देश के
काम नही आयेंगे
जो कुछ करने आये है
और जीवन की परिभाषा
पढ़े बिना ही चले जायेंगे
और हम सुंदर वतन नही
बना पाएंगे ,,,,,,,,,!!!
भगत सिंह बेनीवाल

अपनी खुशियाँ

कबतक डालते रहेंगे
अपनी खुशियाँ उनकी
मशालों में ,,,,,,,
खुद के घरों के आँगन में
अँधेरा करके ,,,,,
कबतक देंगें पहरे उनके
कंगूरों के लिए ,,,
अपने घरों की चोघट
सुनी छोड.कर
जो हमारे सामने

हमारे ही वतन को
को खोखला कर रहें है
हमारी आँखों में धुल डालकर ,,,,!!!
।भगत सिंह बेनीवाल ।

जख्म जब और भी और
भी हरा हो जाता है
जब मेरे वतन के सिपाही
का जनाजा ,,,
नेता-अभिनेता के काफिले
के आगे फीका नजर आता है

बिना किसी शोर के
पतली सी गली से गुजर
जाता है मेरा दिल उसकी
छोटी सी झलक को तरस जाता है
उसको में हर कंगूरे पर हाथ
बांधे पता हूँ ,,,,,,,,,,
उसके लिए इतना कुछ हो जाता है
जो जीता है खुद के लिए
इक अमिट मुस्कान के साथ
अपने प्राण कर देता है वतन के हवाले
उसके लिए कोई अपने आशियें से बाहर
नही आता है ,,,,,,
जख्म जब और भी हरा हो जाता है
जब ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

देश का जोश बेठा है सिनेमा के पेड. के नीचे

देश का जोश बेठा है सिनेमा के पेड. के नीचे
अपने कानो व् पलकों को बंद करके
बस आनंद ले रहा है उस पेड.की छांव का
उसे पता ही नही है अपने वतन की पीडा.ओं का ,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Saturday, 6 October 2012

कंधे

आपने कहा हमसे की
मंजिलें पा तो लूँ में ,,,
पर सीढियाँ नही है
हमने अपने कंधे,,,,,,
तुम्हारे हवाले कर दिए
तुमने पाली मंजिलें ,,,,,
हमारे कन्धों को आज
भी इंतजार तुम्हारा है ,,,,
छोटी सी चाहत है की
की तुं आकर देख ले ,,,,,

अपनी आँखों से
की जख्म दिल में
नही कन्धों पे भी होते है ,,,!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Friday, 5 October 2012

ये हुई न बात
वो जीना भी क्या जीना
ना लब्बों पे हंसी
माँ चहरे पे मुस्कुराहट

।भगत सिंह बेनीवाल ।


हालत

आँखें नम हो जाती हैं
ये हालत देखकर
सांसें रुक जाती है
ये आंशुओं की बरसात
देखकर
छाता ओढ़कर निकल
जाता है हर कोई
ये बरसात देखकर ,,,,!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Wednesday, 3 October 2012

जब बात अधूरी रह
जाती है ,,,,,,,
जब मुलाकात अधूरी रह
जाती है ,,,,,,,
तो चाहत दुगनी हो
जाती है ,,,,,
वो बात ,वो मुलाकात याद
आती है ,,,,,,
जब हो जाये पूरी
बात और मुलाकात ,,,,,,

तब किसको किसकी याद
आती है ,,,,,,,
तभी तो कह रहा हूँ तुमसे
हर बात अधूरी हो ,,,,,,
हर मुलाकात अधूरी हो
वो रिश्ते भी क्या रिश्ते,,,,,,,,
जिनमे दुरी ना हो,,,,,
हमने हो उनकी जरुरत
उनको मजबुरी हो ,,,,
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

बात और मुलाकात

जब बात अधूरी रह
जाती है ,,,,,,,
जब मुलाकात अधूरी रह
जाती है ,,,,,,,
तो चाहत दुगनी हो
जाती है ,,,,,
वो बात ,वो मुलाकात याद
आती है ,,,,,,
जब हो जाये पूरी
बात और मुलाकात ,,,,,,

तब किसको किसकी याद
आती है ,,,,,,,
तभी तो कह रहा हूँ तुमसे
हर बात अधूरी हो ,,,,,,
हर मुलाकात अधूरी हो
वो रिश्ते भी क्या रिश्ते,,,,,,,,
जिनमे दुरी ना हो,,,,,
हमने हो उनकी जरुरत
उनको मजबुरी हो ,,,,
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Tuesday, 2 October 2012

कांटे

कांटे तो राहों में ही मिला करते हैं
जो डरते हैं उन काँटों से
वो उन राहों पे नही मिला करते है ......
भगत सिंह बेनीवाल
१ .दुनिया का सबसे कठिन काम है खुद को जानना .....!!!
२ . दूसरों से कभी भी बहस मत करना अगर कर सको तो
खुद से जरुर करना .....!!!
भगत

दो लफ्ज

तुमने दो लफ्ज क्या कहे
मैंने खुद को भुला दिया ....
भगत सिंह बेनीवाल

जिंदगी

जिंदगी पैसों से नही संस्कारों से जी जाती है
भगत
मैं किस को बदलूं की
आज ये हालत बदल जाएँ .......!!!
मैं खुद को तो बदल लूँगा
बस फिकर तो तेरा है ........!!!

भगत सिंह बेनीवाल

हालत

हालत जीना सिखाते हैं
बंद राहों के रस्ते दिखाते हैं
हालत के पीछे तो मंजिल होती है ...
हालत तो मंजिल के दरवाजे पे होती है
भगत सिंह बेनीवाल

सीख ले ...!!

अगर पाना चाहते हो किसी को तो
खुद को खोना सीख ले ...!!
अगर हँसाना चाहते हो किसी को तो
खुद रोना सीख ले ...!!
भगत सिंह बेनीवाल
मुझे पता था ये होगा
मुझसे ज्यादा भरोसा
तुझे किसी और पे होगा .....!!!
भगत सिंह बेनीवाल

दो कदम

छोटे से लफ्जों को
मुलाकात समझ बैठे ..!!
चले हम-तुम दो कदम
हम इसे आपका साथ
समझ बैठे ..!!!
भगत सिंह बेनीवाल

तुम्हे देख कर

तुम्हे देख कर
वो भी मुस्कुराये~~~~
हम भी मुस्कुराये`~~~~~
ये ना तो हम जाने ना वो .......
तुमको हम पसन्द आये या वो .....
भगत सिंह बेनीवाल

लकीरें

बन्दे कदर करले जज्बातों की
लकीरें देखता रह जायेंगा हाथों की ....!!
भगत सिंह बेनीवाल

ये वतन मेरा है ....!!

तू चाहें जितना जख्म
दबाले मेरा
तुझसे बहुत देखे है मैंने
ये वतन मेरा है ....!!
भगत सिंह बेनीवाल

आदत रही है हमारी .....

गेरों पे भरोषा आदत रही है हमारी .....
वसूल सब कुछ यही होता है ....
बस याद तुं इनता रखना ........!!!
भगत सिंह बेनीवाल

उमीदें

मुझे आता था तुझसे बेहतर चलना .......
तुझसे उमीदें खुदसे ज्यादा कर बेठा ....!!
भगत सिंह बेनीवाल

आज कोई -कोई

खुद को खुद से चुरा लेता है
आज हर कोई ...!!
खुद को खुद से मिलाता है
आज कोई -कोई ....!!
भगत सिंह बेनीवाल

हद से ज्यादा

हद से ज्यादा मत बढ़ना तुम ..
हम भी उसी कतार में आ जायेंगे
तुम कुछ बोलोगे हमसे ....
हम सुन नही पाएंगे
भगत सिंह बेनीवाल

कंगूरों

मत हँस मन ही मन
देखकर इन पत्थर के कंगूरों को
इन्सान से खुबसूरत तस्वीर नही है
भगत सिंह बेनीवाल
मत कर उसके कहने ........सब कुछ तुं.........मिटा दिए है........ आजतक तुझ जैसे अनेको...... अनमोल...... यहाँ तेरे ही सामने ........कुछ तो सोच,,,,,, हम भी तो तेरे अपने ,,,,,,,,!!!!!
भगत सिंह बेनीवाल

आदत

उसने ठान रखी है तूफ़ान फेलाने ....
मुझे आदत है चिराग तुफानो में जलाने की .....
भगत सिंह बेनीवाल

जिद्द

जिद्द हमने खुद से न की होती
आज तुमसे ये दुरी ना होती .......
भगत
अगर तुमने ये यकीन दिलाया ना होता
काश :मैंने अपना चिराग बुझाया ना होता ....!!!
भगत सिंह बेनीवाल

हमारे जीवन मैं उन चीजों का ज्यादा महत्व है जो हमें एक ही बार मिलती है
भाहत सिंह बेनीवाल
माता -पिता ,समय ,जीवन ,दिल, सच्चे यार इक ही बार मिलते है
जो पहचान जाते है उनके जीवन के मायने बदल जाते है
भगत
 हमने शांति के पेडो.को
खून से सींचा है ,,,
भगत