Friday, 19 October 2012

बकती रहती

बक- बक बकती रहती
अगणित जुबानें
न रूकती है न थकती है
न जाने साथ लाये है
पिछली सदियों के
कितने अफ़साने ,,,,,
खुद को क्या करना है
मजहब की खातिर
क्या करना है ,,,,,,
या यहीं बक -बक करना है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

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