Monday, 15 October 2012

खुद को कितना समझा लेते है

खुद को कितना समझा लेते है
आज हम उनके लिए
जब हम मिलते है उनको
ये बताने के लिए
आपकी ये पहेली
हमे मंजूर नही है
राग में राग मिलते हुए
नजर आते है,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जब बिखर जाता है समूह
उनसे मुलाकात होती है

आपकी उनसे उनको सही
ठहराते हुए नजर आते हो
आपकी पीठ थप थपाते है
है वो और गद -गद हो जाते है
उनकी झूठी सी
मुस्कान में खो जाते है
उनके वादे हमारे दिन के खोखले
सपने बन जाते है
और हम सपनों में खो जाते है
वो इतना कुछ देकर हमे
वापिस अपनी राहों पे
लोट जाते है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
हम खोजते है आपको
ये सोचकर की आप
है हमारे पीछे
तो हमे पीछे दूर -दूर तक पेड.
नजर आते है ,,,,,,,,,,
जब नजरें आगे देखती है
आप हमें उन दरबारों में
हमसे ही बात करते हुए नजर
आते है ,,,,,,,,,,,,,,,!!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

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