Friday, 16 November 2012

दस्तक

सरहद के उस पार से...........
हर दिन नई आवाजें आती है ................
मेरे दरवाजे पे तो दस्तक दे जाती है ..................
रोम -रोम में समा जाती है ....................................
क्या उनके दरवाजे के आगे से ....................................
निकल जाती है ..............................................................!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

चहरे

मुझे आदत किताबों से ज्यादा
चहरे पढने की है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।भगत ।

हुकुमत

जब हुकुमत
गेरों की
हमारे लफ्जों
में झलकने
लगती है
माँ -बाप की
नजरें
बेबस सी
नजर आने
लगती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

सरहद

कोई बात नही है
सरहद पे न जा सके
कोई गिला नही है
अधूरे -पुरे लफ्ज भी
हमारे लिए जुबान पे
नही ला सके ,,,,

हम तो चले गये
किसी ने कहा है
हमसे की वो तो
दो कदम जनाजे के
साथ कब्र तक नही
आ सके ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

नजरें छलकती

नजरें जब दीवारों से
टकराती है ,,,,,,
नजरें दीवारों से
कुछ कहती हुई
नजर आती है
दीवारें चमकती
रहती है
नजरें छलकती
रहती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

Thursday, 15 November 2012

बुटेवाली मखमली चद्दरों

बुटेवाली मखमली चद्दरों
में कैसे चैन आता है
जब जेष्ठ सर पर तपता है
सावन झुग्गीयों से अंदर
तन पे आता है ,,,,,,,,,,,,,!!!
।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

सुरज

अभी तो सुरज निकला ही नही है
अभी तो और सोने दो ,,,,,,
अभी तो आँशु ही नही रुके है
कुछ देर और रोने दो ,,,,,,,,,!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

कब-तक

कब-तक निकलोगे इन
चोखटो से बाहर,,,,,,
हंस के
हर गली में होगा
आंतक आप
क्या करोगे ,,,,,,,,,,,!!!!
।भगत ।
किसी आदमी के हठ में आज
हमारे देश की दिशा बदल दी
वो चाहता तो आज हम ऐसे
नही होते आज दुनिया उसके
चहरे को पुजती है वो अंदर
से क्या था ये कोई नही जनता
वो चाहता था की मेरी
लोकप्रियता कम न हो जाये ,,,,,,,,,,,,
बाकी आप सब जानते हो मेरे से ज्यादा समझदार हो
जय हिन्द जय भारत ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इन्कलाब जिंदाबाद ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम संग

अगर तुम चाहो तो
दो दिन बैठा हूँ तुम संग
तुम्हारी चाहत ही मेरी
सांसें है
मेरा तो यहाँ क्या है ,,,,!!!

||भगत सिंह बेनीवाल ||

तस्वीर नीलाम

ये खुबसूरत तस्वीर नीलाम ना होती
कीमत ये सरेयाम ना होती ,,,,,,,,,,,,,,,
हर जुबान पे ये तस्वीर यूँ
हलाल ना होती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

चूल्हा

नजरअन्दाज करके
उस गरीब को ,,,,,,
जिसका चूल्हा
तरसता है
जलने को ,,,,,,,,
लचीले बिछोनो
पे चैन कैसे आता है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

कंगाल

कंगाल
करके
हलाल
करते है
चुनिन्दा
सफेदपोश
भूलकर
पनी
ओकात
करता है

छोटे
मुंह
ऊँची
बात ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

पराया

कोन पराया
कोन अपना है
बस ये तो एक
सपना है जो
कुछ देर तो
अपना है
फिर राहें ताकना है
बंद पलकों में
नये सपने झाकना है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।
हम खुद को
जान नही पाए ,,,,
 गिला दुनिया
से किया
जाते -जाते ,,,,,
की दुनिया वाले
हमे पहचान
नही पाए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

????

मैंने क्या देखा है ,,,,,,,,,,,,,,,,????
क्या देख रहा हूँ ,,,,,,,,,,,,,,,,,????
क्या देखूंगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,????
जिस दिन कर लेंगे
ये सवाल खुद से ,,,,,,
सूरज नई लाली
लेकर आएगा
चंदा सुनहरी
हंसी हँसता हुआ
नजर आएगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सब कुछ तेयार है ,,,,,,,,,,,,,,,
बस ये दिन कब आएगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

निशान

हर किसी की आँखें निशान
छोड.जाती है ,,,,,,,
हर अनजानी जुबान पहचान
छोड.जाती है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

शक्ल से नफरत

गरीब की शक्ल से नफरत
करता हुआ नजर आता है
हर कोई ,,,,,,,,
खुद की शक्ल आयने में
देखकर मुस्कुराता है आज
हर कोई ,,,,,,,,

क्यों नही जलती है
गरीब की रसोई
ये नही सोचता है
हर कोई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

अनाज के दानों

दो अनाज के दानों
के लिए सड.कोँ के
किनारे छोटी सी छाप
छोड. जाते है ,,,,,,,,
कहाँ से दिखाएँ हुनर वो
पेट भरने की लालसा
में एक अधुरा किस्सा
छोड. जाते है .............................!!!!

।।भगत सिंह बेनीवाल ।।

दुखती रगो का जुगाङ

कन्धे पे थेले
थेले मे देह के
अन्दर ,,,,,,,,,,,,,
दुखती रगो का
जुगाङ,,,,,,,,,,
नजारा कीसी
ना कीसी ,,,,,,,,,,
रास्ते के कीनारे
झलक जाता है ,,,,,,,,,,,,,
छोटा सा बच्चा

मां- मां कहता
नजर आता है ,,,,,,,,,,,,,,,
मेरी अंगुली
पकङा हुआ बच्चा
उस बच्चे की ओर
तकाता है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरा बच्चा मुझसे
ही फट्कार खाता है
फैसला यहीं बढ़ जाता है ,,,,,,,,,,,,!!!!!
कवीता अधुरी है

।।भगत सिंह बेनीवाल।।

हम वतन यार

मत करना गम
मेरे हम वतन यार
बिछ्ङ गये तो
क्या हुआ ,,,,,,,
कभी बिछ्ङे थे तभी
तो आज यहॉ मिले है
आज बिछ्ङेगें तभी
तो आगे मिलेगें,,,,,,,,,
ये सिलसिला युहीं
कायम रखेगें,,,,,,,,,,,,

आ जाना निभा के
अपनी जिम्मेदारी ,,,,,,
हम तुमको तैयार मेलेगें,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

हाथ ,,

कब तक फेलते रहेगें हाथ ,,
राहों में,,
कब आयेगें ये हाथ ,,,
निगाहों में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

अनजानी चोखट

दो हाथ बाधं कर ,,,,,
अनजानी चोखट
के दरवाजे को
खटखटाता है,,,,
ओढाकर सफेद
चद्दर छिपा लेता है
असलियत को,,,,,
देखकर अनजानी
तस्वीर चोखट
अपनी पे विवश

हो जाता है,,,,,,,
रखकर पत्थर
कलेजे पे
भेटं चढा देता है ,,,,,,
तस्वीर अपनी बेटी की,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

अलाव

जा रहा था निगाहें
उढाये…।
अलाव जलाते हुये
धुंध ले चहरे नजर
आये…।
अंधेरी थी रात
अलाव की रोशनी
में मेरे लोचन
उन बिम्बों को
निखार नही पाये

लोचन बोले मुझसे
काम तेरा अधुरा रह
जायेगा………।
कुछ शब्द बारिस की
बुन्दों की तरह मेरे
कानों मे घुस गये
कानो ने आंखो की ना
मानी …
उन चहरो की बात जानी
शब्द ये थे वो …………।
ये सर्दी ना हो तो इस
तन को दो पल का आराम तो हो
नजर को ये नजारा फुट्पाथ का था…
एक फट्टा हुआ कम्बल
दो जलती हुई लकङीयों का आसरा था………………………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

साहस

देखकर ये हकिकत
हतास हो जाता हुं…………।
बनावटीपन मे कहां
से साहस जुटा पाता हुं……।

||भगत||

दोलत …

दोलत ……

दो+लत ==== दोलत

(1)एक तो सब कुछ भुला देती है……॥

(2)दुसरी सब कुछ याद दिलाती देती है…॥

||भगत ||

खुद तक ही सीमित रखा है

खुद तक ही सीमित रखा है
तुमने मुझे वरना दुनिया हमें भी सलाम करती,,,,,,,,,,,,,,,,

प्यार की कोई मात्रा नही होती

नफ़रत की कोई सीमा नही होती है………………॥
प्यार की कोई मात्रा नही होती……………………॥
||भगत||

रिस्ते

रिस्ते है रिस्तो का क्या ………॥
जब तक है जिंदा है
शिकायत हमसे ना होगी ………॥
पता ही नही लगेगा……………॥
हमरी वफा कब धराशायी होगी………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

चद्दर

रातें अक्सर लम्बी होती है…॥
ये शिकायत अक्सर हमें रहती है……॥
ये तो उन से पुछो जिनकी हर रात ………॥
मच्छरों की चद्दर के निचे गुजरती है……………………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

खामियां

खामियां
बन्द हाथों
के साथ्…
अपनी
पत्थरों
को बताता
हुआ नजर
आता हुं
उन को तो
सब पता है

मतलब ये
हुआ की
खुद की
खामियां
खुद को ही
बताता हुं
सुना है
मैने की
जो कर लेता
है चिन्तन
खुद का
वो सुधर
जाता है
मुझे तो
ऐसा कोई
नजर नही
आता है
बस फ़र्क
यही है
इंसान
इंसान को
अपनी
खामियां
सुनाने
का साहस
नही जुटा
पाता है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,!!!!!!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

दोस्ती

दोस्ती एक अनमोल गह्ना है …….………………॥
जिसका मोल दुनिया के किसी भी बाजार मे नही है….….….…….…………………………………………॥

||भगत||

फ़ुट्पातो

उस नजर को भी ये नजारा ……॥
नजर आता …॥
फ़ुट्पातो पे ये जमावङा नजर आता ………॥
हर फुटपाती धनतेरस मनाता हुआ …………॥
दिखाई दे जाता ………॥
कुछ गुप्त दान सरकार के खजाने मे आता…………॥
हर फुट्पाती दिपावली के …………॥
पटाखे बजाता ओर लक्ष्मी
पुजन करता हुआ नजर आता……………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

गरीब

हम गरीब नही है
खानदानी ………॥
तुती हमारी भी
बोला करती थी……॥
हमारे खानदान को
गोरों से नफ़रत थी……॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

फर्श से अर्स

आज अर्स की बात
करते है हम-तुम
हर दिन हर रात
बात फर्श से अर्स की
कम ही करते है
हम - तुम आज ……………………॥

||भगत||

सुगंध

सुगंध बगीचे से आती है
तारिफ़ बगीचे की नही
फुलों की होती है
निगाहें फुलों पर ही
टिक जाती है
गमले की ओर किसी की

नही जाती है
फुलों की चमक
हर नजर पर छाप
छोङ जाती है
हद तो तब हो जाती
उस माली की
दिन-रात की कहानी
किसी को नजर
नही आती
वो खामोश तस्वीर
कुछ दुरी से ये सब
देखती रहती है,,,,,,,,,,,,,,!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

किस्सा

किस्सा ये नया नही है……………………बहुत पुराना है…………दो अनजान मुखङों का मिलना ………………कुछ दुर तो……………… साथ-साथ चलना……………अचानक बिछ्ङ जाना………………………॥

||भगत||

हाल

ये मत पुछ मुझसे की हाल क्या है उसका……
क्या तुझे आज भी ख्याल है उसका………………॥

||भगत||

मुरझाई हुई तसवीर

उसकी मुरझाई हुई तसवीर
मुझे हतास कर गई ……॥
मेरे जहन मे नफ़रत का
उल्लास कर गई…………॥
नफ़रत पुरी भी नही कर सका
उसकी यादों का …………॥
सिलसिला शुरु।हो गया
मेरे जख्मों पे रब से की हुई……॥
वो फ़रियाद आ गई
मुझे मेरे जख्मों की मवाद याद गई ………………॥

||भगत ||

सुनसान

ना जानें कितने ही सुनसान देखता हुं
शब्दों के बङे बङे गुब्बार देखता हुं…………………॥

||भगत ||

पैनी धार

बिना किसी सहारे के
जिन्दगीयां गुजरते हुए
देखता हुं…………॥
लब्बों पे पैनी धार देखता हुं………………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||

कुरकुरे

कुरकुरे उसका बेटा भी खाता है
उसका बेटा भी कुरकुरे खाता ह……॥
उसका बाप भी कमाता है
कमाता है उसका बाप भी…॥
उसी दुकान से उसका बेटा लाता है
उसका बेटा भी उसी दुकान से लाता है……॥
उसका बेटा भी थैला उठाता है
थैला तो उसका बेटा भी उठाता ह……॥
बेटा उसका दोपहर में आता है
दोपहर मे ही उसका बेटा आता ह……॥

बस फर्क इतना है दोनों में
उसका बेटा थैला उठाकर पाठशाला जाता ह…॥
बेटा उसका सङक के किनारे जाता है
वो कमाये हुये लाता ह……॥
वो खुद कमाकर लाता है
पुछ लेता हुं किसी से तो को……॥
इसे किस्मत का दस्तुर बताता है

कोई कुछ ही बता जाता है……………………॥

||भगत सिंह बेनीवाल||