Thursday, 15 November 2012

सुगंध

सुगंध बगीचे से आती है
तारिफ़ बगीचे की नही
फुलों की होती है
निगाहें फुलों पर ही
टिक जाती है
गमले की ओर किसी की

नही जाती है
फुलों की चमक
हर नजर पर छाप
छोङ जाती है
हद तो तब हो जाती
उस माली की
दिन-रात की कहानी
किसी को नजर
नही आती
वो खामोश तस्वीर
कुछ दुरी से ये सब
देखती रहती है,,,,,,,,,,,,,,!!!!

||भगत सिंह बेनीवाल||

No comments:

Post a Comment