अगर हम होते आप जितने होशियार …… सफ़ेद चहरे आज भी देश ही गलियों मे नजर आते……॥ आप तो आप ही हो … आप तो खुद के भी नही हो हम आपके कैसे हो गये…॥ तभी तो हम समय से पहले चले गये…॥
मैने पुछा धरती मां से मां ये क्या हाल बना हुआ है इस वतन में कभी मिसाल हमारी भी दी जाती थी आज क्या हो गया है वो सुरमें आज क्यों नही जिनसे यम भी घबराता था मां का जबाब मुझे बेसुध कर गया बोली बेटा … क्या तुम्हे वो क्या याद है ????????????????????
उसकी एक झलक हजारों मुसाफ़िरों के रास्ते बदल जाती है ना जाने कितने ही रास्ते जाम हो जाते है हाथ हिलाकर छुमंतर हो जाते है…॥ क्या हक उन्हें है किसी की राहें बदलने का……………॥
गरीब वो नही है जिसके तन पे पुरा कपड़ा नही है सोने को जगह नही है खाने को पुरा खाना नही है अरे गरीब तो वो है जिसके पास पैसे है पर कपड़े नही है तन ढ्कने को खाना है पर स्वाद का पता नही है
बिस्तर है पर चैन नही है जिसके पास कुछ नही है उसके पास सब कुछ है ओर जिसके पास सबकुछ है उसके पास कुछ नही है
ये सोचकर ही ले लेते होगें आप फैसला मेरी किस्मत का ओर फेंक देते हो कुड़ादान में चलते हुये शमशान में …… हमनें जो अमानत खुन-पसीने से है कमाई ये डायन एक दिन में लुटकर चली जायेगी……पराये देश में……॥
दशहत मेरी आपके दिलों में युं घर कर गयी है… मुझे मिटाने की जिद्द आपकी आज तो मेरे भाईयों केसर भी कोख मे कलम कर गयी है…… आजकल तो मैं आती ही कहां हुं कोख में…… फिर भी पुन्य का काम कर ही लेते हो…… वो परम भी नही भेज रहा है
इस धरा पे…… कहता है बेटी सफ़र बहुत लम्बा है क्या करो गी जा कर.... खड़े पांव ही लोट आना है............!!!!!
भगत सिंह बेनीवाल
मेरी आपके दिलों में युं घर कर गयी है… मुझे मिटाने की जिद्द आपकी आज तो मेरे भाईयों केसर भी कोख मे कलम कर गयी है…… आजकल तो मैं आती ही कहां हुं कोख में…… फिर भी पुन्य का काम कर ही लेते हो…… वो परम भी नही भेज रहा है
इस धरा पे…… कहता है बेटी सफ़र बहुत लम्बा है क्या करो गी जा कर.... खड़े पांव ही लोट आना है............!!!!!
जैसा भी हुं मुझे रहने दो आप इसी हालात में मैं खुद भी नही अडिग अपनी बात पे क्या असर करेंगी आपकी ये धारा मुझपे सिकने दो आप मुझे इस धुप में इम्तिहान खुद का
लेने दो …॥ जैसा भी हुं मुझे रहने दो आप इसी हालात में आन्नद नही रहा है अब इस फीकी मुस्कुराहट में……………॥
जीवन एक हीरे की तरह है जितना चमके उतना ही कम है…॥ ना चमके तो गम है अगर चमक गया तो क्या गम है……॥ ना चमके तो हजार जन्म भी कम है……॥ अगर चमक गया तो इस जीवन का समय ही काफी रह जाता है…॥
तेरी - मेरी ये करतुत ना जानें कितनी ही जुबानों को बेजुबान कर जाती है…… हरे -भरे आंगन को बिरान कर जाती है
हमारी सिद्धी तो सिद्ध हो जाती है पलायन कर जाती है… वो तस्वीरें उस धरातल से क्या ह्में इतना हक है……… अभी तो हम अनजान है इस बात से भी की हस्ती क्या है हमारी…॥ सुधर जाओ अब तो बहुत हो गया है ये खेल वरना इक इंकलाब ओर आयेगा……… क्या यही चाहते हो तुम ………… हम ही भगत, सुभाष , आज़ाद है ………
लिख …लिखकर ……लिखना……… सीख जायेगें आप दोगे साथ तो ……कुछ पहले …सीख जायेगें … वरना कुछ वक्त और सही … जिद्द तुमसे नही खुद से की है ……पलायन से पहले ही जरुर सीख जायेगें………,,॥
वो पैसा भी क्या काम का जो औलाद को लाचार बना जाये अखबारों ओर टी,वी, में खबर आये…… जिसका बाप हो नेता या अफ़सर कोई बड़ा औलाद उसकी खुद को खुदा मानने लग जाती…॥
इतना कुछ किया था उन्होने वतन के वास्ते आप बचा तो ना सके … ये आपकी भुल ही सही गलतीयां अक्सर हो जाती है… इन्सानों से ……… कुछ ऐसा जाना है मैने की बोटी-बोटी कर दी थी… बोरीयां भर दी थी…… केरोसीन से स्वाह कर दी थी……
आंसूओ का सैलाब नही आता पर आपकी बिकी हुई जुबान ने वो जमीं आंसूओं से दलदली कर दी थी……॥ ………जय हिन्द जय भारत ……
पहला सलाम सुरज को तेरा होता है…… कदम भी तेरे ही रखे जाते है इस स्थल पर पहले खुन -पसीना बहाने मे भी अव्वल सबके लिये करने वाला ही तु जब नाम आता है की कुछ तो करो इसके लिये भी तो हर कोई स्थान क्यों छोड़ जाता है……
क्या तु इतना अभागा है…… क्या इसीलिए कच्ची नींद मे जागा है …… कुछ अरमान तो तु भी सजोता है
चाहें मन्दिर तोड़ो या मस्जिद तोड़ो दोनों मे इन्सान ही रहते है इन्सान ही इन्सान से ही मिलते है हम तो इन्सान ही तोड़ रहे है………… अपनी जुबान से बोलते है हम इन्सान जोड़ रहे है……………॥
भगत …………/॥
मुझे भी आते है ये प्यार भरे हर्फ़ लिखने असर क्या करेगें आपकी सेहत पर आज तो नफ़रत भी तो इस कद्दर है भाई को भाई से बहिन को भाई से इंसान को खुदा से बंदे को मंदिर मस्जिद से हम से तुम से तुम को हम से वतन भी रास नही आ रहा है………… तो ये कागज काले क्यों करुं
एक रुल ऐसा भी आ सकता है की यहां पे विदेशी कलम हमारे सफ़ेद कागजो पे लिखे गी ……………………॥
इन झोंपड़ीयो में जाने पहचाने चहरे को चरता हुआ देखता हुं इक बनावटी आनन्द देखता हुं सबरी का प्यार ओर त्याग देखता हुं उस चहरे की दरियादिली देखता हुं उसकी रसोई का समान देखता हुं उस चुल्हे का बलिदान देखता हुं बिन बुलाये महमान देखता हुं कैसे पचाता होगा वो
युं बेवजह किसी को सताया नही करते है किसी की मजबुरी का फ़ायदा उठाया नही करते है जो है मजबुर तो झुक जाती है नजरें उसकी झुकी हुई नजर को भी है हक ये सुन्दर गगन देखने का ये विरासत हमारी जागीर नही है जो तुं फ़ुद्क-फ़ुद्क कर चल रहा है
ये तो बस दो दिन का खेल है ये कागज के पन्ने तो बस हाथों का मैल है आज यहां कल कही ओर सही …… खुद के आंचल मे झांक ॥
इक ललक जो जाग्रत होती सुरज किरणों की तरह मेरे जहन में …… उम्मीदों का झरना सा बहा देती है मेरे जहन अब तो कुछ होगा …… सपना जो देखा था यथार्थ दे दुर कभी बंद पलकों मे ही सही अब तो यथार्थ इस बात का गवाह होगा ……
ये शर्त तो ना थी उस वक्त मै एक झलक का भी प्यासा रह जाऊँगा ……
कागज के फूल कहां बहते है ज्यादा देर तक दरिया में …… वो तो हमारे अहसास को जिन्दा रखने लिये ही उन लहरों से टक्कर लेते है …… जैसे अस्पताल मे रोगी को क्रत्रिम श्वास देते है अगर अब भी हमें हो गीला फुलों से तो बेजुबान हुं मै …… जो भी हुआ तेरे साथ अक्सर होता है सभी के साथ …… बंद कर दे अब भी वक्त है बंद पलकों मे सपनें संजोना जिंदा दिलों का काम नही होता है ये सपना तो वही सच होता है जिसका मुकाबला य्थार्थ से होता है
मैने लहलाती फसल हुं लहलाने दो मुझे ........ उस की इज्जत आबरु हुं मै जो मेरे लिये रात -दिन जागता है कच्ची नींद मे भागता है उसकी सांसे हुं मै …… उसके परिवार का सुनहरा सपना हुं मैं ……॥
राहें ना बदलती है राहगीर बदल जाते है सांसे नही थमती है शरीर थम जाते है तकद्दीर नही बदलती है ताकत बदल जाती है समझ ना बदला करती है समझदार बदल जाते है रिस्ते नही टुटते है रिस्तेदार टुट जाया करते है
हक नही दबता है हकदार दब जाया करते है वफा दगा नही देती है वफादार दगा दे जाया करते है आप हमें देखकर हम आपको देखकर भी बदल जाते है ………………………॥
जिसे हम रास ना आये भला उसे कोई ओर क्या आयेगा …… जो हमे भी ना जान पाया भला किसी ओर को क्या जान जायेगा ……… हमने तो कर ली थी तैयारी इक ताज बनाने की ……… हाल यही रहा उसका तो इक ओर ताज अधुरा छोड़ जायेगा …………॥
आपके
पास की ऐसी सूचनाएं जिसे आप हमारे साथ साझा करना चाहे या फिर पूरे देश को
बताना चाहे, तो स्वागत है आपका dainikvishwabharti.com news portal keमैं
भी रिपोर्टर में.
अब तक जुबां पे लगाम क्यों है ये भी तो सोच तु …………… घर का बर्तन भी गिरता है आंगन मे आवाज चोपाल तक जाती है ……… बस यही बात है मैने सुना है की समझदार को तो समझ इशारों से ही आ जाती है ……………॥
कुछ ये भी तो देख लो जरा ………कहते है आदमी को वर्तमान ओर भविष्य का फ़ैसला करने से पह्ले भुतकाल भी देख लेना चाहिये ………………जय हिन्द
ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही
अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इसकी
स्थापना 1600 ई. के अन्तिम दिन महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक घोषणापत्र
द्वारा हुई थी। यह लन्दन के व्यापारियों की कम्पनी थी, जिसे पूर्व...See More
भीड़ से अलग रहे .... ना किसी को पाया है ना किसी को खोया है जिसने हमे जाना वो अब भी पास है …………… जिसको हमनें जाना वो तो बहुत ही खास है ……… ना फिजूल खर्ची ना टाइम पास है हर काम बड़ी सिद्दत से होता है
राष्ट्र - प्रेम खेल नही है भगत तेरे कागज ओर कलम का बस बोली लगती है ओर उन अलमारीयों की शोभा बनती है …… वाह -वाह होती है तालियां बजती है महफ़िले हँसती …… क्या यही तेरे अरमान भगत सोच थी तेरी की
बिखरे हुये हर्फ़ो को आशियाना दे दुं कुछ परिवर्तन तो होगा ही अगर है ये परिवर्तन तो मुझे बाढ कही नजर ना आ रही है मुझे अपनी गलती की सजा मत देना गलतीयां अक्सर हो जाया करती है बन्दे से …… यहां तो खुन भी सस्ता मिलता है आज …
अब नही तो कुछ देर ही सही सड़को पे तो आना ही होगा जिनको भुल बेठे है हम उनकी तस्वीरों के साथ फिर से आना होगा भलाई तो इसी में है पांव रखने से पहले ही संभाल ले इस जमीं को वरना खुन तो बहाना ही होगा
अब तो साबित ही हो गया है ये जंग खा गये है ये हाथ काम करने की नियत को हासिल करना होगा …………
लाखों समझाया ……… उसको समझ ना आया वो हर मन्दिर -मस्जिद जाके आया …… उसका ये वक्त मुझे उन हालातों से उभार लाया ………… अब मुझे हर मन्दिर मस्जिद मे वो ही नजर आता है………………॥
मेरी
जानकी मौसी के घर जब तीसरी बेटी ने जन्म लिया था ,तब उस समय अड़ोस
पड़ोस,रिश्तेदार सब ने उनके पास आ कर उनके यहाँ तीसरी लडकी केपैदा होने पर
अफ़सोस जताया था ,लेकिन जानकी मौसी ने उन सबक ा यह कह कर मुंह बंद कर दिया था ,”यह मेरी बेटी है मैने ...See More
हर दिन जब आता है लाली के साथ कहता है बहुत कुछ मुझसे……… मौन हो जाता हुं जाता -जाता ये ही सवाल फिर दोहरा जाता है………… ये कहकर विदा कर देता हुं……… आज तो कुछ सही नही कल फ़िर आना तुम जरुर कुछ करुंगा …………
वो तो कायम है अपनी जुबां पे सवाल खुद से कर उससे मत डर की वो आयेगा उसका यही काम है आना - जाना आता रहेगा - जाता रहेगा इक जिद्द ही काफी है खुद से उसके हर सवाल का राज छिपा है उसमें कुछ तो कर ले बन्दे हर बार नही कहेगा …………… तुमसे की कुछ तो कर बन्दे ………… वो यु हंसेगा की ऐसी आज तक ना देखी होगी तुमने कभी …………॥ हर किसी को किस्सा तेरा ही सुनायेगा………॥… कुछ तो कर बन्दे … कुछ तो कर बन्दे … कुछ तो कर बन्दे …