इक ललक जो जाग्रत होती
सुरज किरणों की तरह
मेरे जहन में ……
उम्मीदों का झरना सा
बहा देती है मेरे जहन
अब तो कुछ होगा ……
सपना जो देखा था यथार्थ दे दुर
कभी बंद पलकों मे ही सही
अब तो यथार्थ
इस बात का गवाह होगा ……
सुरज किरणों की तरह
मेरे जहन में ……
उम्मीदों का झरना सा
बहा देती है मेरे जहन
अब तो कुछ होगा ……
सपना जो देखा था यथार्थ दे दुर
कभी बंद पलकों मे ही सही
अब तो यथार्थ
इस बात का गवाह होगा ……
ये शर्त तो ना थी उस वक्त
मै एक झलक का भी प्यासा
रह जाऊँगा ……
कागज के फूल कहां बहते है
ज्यादा देर तक दरिया में ……
वो तो हमारे अहसास को
जिन्दा रखने लिये ही
उन लहरों से टक्कर लेते है ……
जैसे अस्पताल मे रोगी को
क्रत्रिम श्वास देते है
अगर अब भी हमें हो गीला फुलों से
तो बेजुबान हुं मै ……
जो भी हुआ तेरे साथ अक्सर होता है
सभी के साथ ……
बंद कर दे अब भी वक्त है
बंद पलकों मे सपनें संजोना
जिंदा दिलों का काम नही होता है ये
सपना तो वही सच होता है
जिसका मुकाबला य्थार्थ से होता है
भगत सिंह बेनीवाल ……………जय हिन्द
मै एक झलक का भी प्यासा
रह जाऊँगा ……
कागज के फूल कहां बहते है
ज्यादा देर तक दरिया में ……
वो तो हमारे अहसास को
जिन्दा रखने लिये ही
उन लहरों से टक्कर लेते है ……
जैसे अस्पताल मे रोगी को
क्रत्रिम श्वास देते है
अगर अब भी हमें हो गीला फुलों से
तो बेजुबान हुं मै ……
जो भी हुआ तेरे साथ अक्सर होता है
सभी के साथ ……
बंद कर दे अब भी वक्त है
बंद पलकों मे सपनें संजोना
जिंदा दिलों का काम नही होता है ये
सपना तो वही सच होता है
जिसका मुकाबला य्थार्थ से होता है
भगत सिंह बेनीवाल ……………जय हिन्द
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