इन झोंपड़ीयो में
जाने पहचाने चहरे को
चरता हुआ देखता हुं
इक बनावटी आनन्द देखता हुं
सबरी का प्यार ओर त्याग देखता हुं
उस चहरे की दरियादिली देखता हुं
उसकी रसोई का समान देखता हुं
उस चुल्हे का बलिदान देखता हुं
बिन बुलाये महमान देखता हुं
कैसे पचाता होगा वो
जाने पहचाने चहरे को
चरता हुआ देखता हुं
इक बनावटी आनन्द देखता हुं
सबरी का प्यार ओर त्याग देखता हुं
उस चहरे की दरियादिली देखता हुं
उसकी रसोई का समान देखता हुं
उस चुल्हे का बलिदान देखता हुं
बिन बुलाये महमान देखता हुं
कैसे पचाता होगा वो
अफसोस है ये ना देख पाता हुं
भगत सिंह बेनीवाल …………जय हिन्द
भगत सिंह बेनीवाल …………जय हिन्द
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