जा रहा था निगाहें
उढाये…।
अलाव जलाते हुये
धुंध ले चहरे नजर
आये…।
अंधेरी थी रात
अलाव की रोशनी
में मेरे लोचन
उन बिम्बों को
निखार नही पाये
उढाये…।
अलाव जलाते हुये
धुंध ले चहरे नजर
आये…।
अंधेरी थी रात
अलाव की रोशनी
में मेरे लोचन
उन बिम्बों को
निखार नही पाये
लोचन बोले मुझसे
काम तेरा अधुरा रह
जायेगा………।
कुछ शब्द बारिस की
बुन्दों की तरह मेरे
कानों मे घुस गये
कानो ने आंखो की ना
मानी …
उन चहरो की बात जानी
शब्द ये थे वो …………।
ये सर्दी ना हो तो इस
तन को दो पल का आराम तो हो
नजर को ये नजारा फुट्पाथ का था…
एक फट्टा हुआ कम्बल
दो जलती हुई लकङीयों का आसरा था………………………॥
||भगत सिंह बेनीवाल||
काम तेरा अधुरा रह
जायेगा………।
कुछ शब्द बारिस की
बुन्दों की तरह मेरे
कानों मे घुस गये
कानो ने आंखो की ना
मानी …
उन चहरो की बात जानी
शब्द ये थे वो …………।
ये सर्दी ना हो तो इस
तन को दो पल का आराम तो हो
नजर को ये नजारा फुट्पाथ का था…
एक फट्टा हुआ कम्बल
दो जलती हुई लकङीयों का आसरा था………………………॥
||भगत सिंह बेनीवाल||
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