Thursday, 10 January 2013

शहिदे आजम भगत सिंह को पढा मैनें ये लिखा …………

लिखकर एक सफेद कागज पर
बहुत कुछ …
निकला ऐसी यात्रा पर जिसका किनारा नही
किसी का सहारा नही……
ना जंगल ना समंदर ना धरा ना आसमान
एक शब्द चुभ गया था अपनो का ही
डालकर जान उस कागज में विदा हो गया
साफ दिल के साथ …कागज आज भी जिंदा है
उनका खुलापन बातुनी बन गया …
एक गलतफहमी थी सिवाए इसके कुछ नही …
आशाओं ओर आकांक्षाओं से भरपूर मिसाल
जीवन के आनंदी रंगो से ओत-प्रोत …
सही वक्त जानकर अपना सब कुछ लुटाना
बलिदान जाना …
प्रेम ओर घृणा को आवेग जाना …
ना ईश्वर जाना ना खुदा जाना ना ईसा तो
नाही नानक जाना …
बस माना तो आत्मा का निर्देश माना …
इसमें ही आनंद जाना …
खुद शिकार बनकर शिकारी को जाना
जहां पर थे कदम उसको ही घर माना
उसे ही बेहतर स्थिति माना ……
कागज आज भी जिंदा है
कागज आज भी जिंदा है
कागज आज भी जिंदा है…….…………………जय हिन्द

……………………………भगत ………….……………………

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