सिमेट कर लाखों अरमान
सोयी थी मेरी बहिना
उस रात को …खुद से बोली
कल बदल दुंगी राह इस देश की
मेरे कंधों पे है वजन इस वतन का
कोई ना लड़ेगा अब
जिंद्गगी ओर मौत के दरमियान
यही धुन सोने भी ना दे रही थी
मेरी बहिना को
कमरे की खिड़की से हुआ उजाला
खुद से बोली आज तो देर हो गई
पता ही नही लगा की ये सवेर हो गई
मां बोली बेटी खाना तो खा के जाओ
बहिना बोली ना देर हो गई
बेटी साथ लेती जाओ …माँ तो माँ होती है
जब तक ना पहुची उस विधा के मन्दिर तक चैन ना था
जो सीखना था बाकी वो सीखा …
पता ही ना लगा ये दिन कब ढल गया …
अब तो कुछ ही दिन की बात है …
कुछ ही दिन ओर आना है मन्दिर मे
लेकर बस्ता चल दी आशियाने की ओर
उस तो इन्सानियत पता थी …
सबसे बड़ी सहेली भी थी …
उसने किया भरोशा अपनी सखी पे
सखी ही दगा दे गयी …
जो एक सपना थी खुद
एक रोशनी की किरन थी
सबकी जुबान थी आज
खुद ही बेजुबान होके रह गयी ……
जिंद्गगी ओर मौत के दरमियान
खुद आ गयी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरी प्यारी बहिना ………
भगत सिंह बेनीवाल
सोयी थी मेरी बहिना
उस रात को …खुद से बोली
कल बदल दुंगी राह इस देश की
मेरे कंधों पे है वजन इस वतन का
कोई ना लड़ेगा अब
जिंद्गगी ओर मौत के दरमियान
यही धुन सोने भी ना दे रही थी
मेरी बहिना को
कमरे की खिड़की से हुआ उजाला
खुद से बोली आज तो देर हो गई
पता ही नही लगा की ये सवेर हो गई
मां बोली बेटी खाना तो खा के जाओ
बहिना बोली ना देर हो गई
बेटी साथ लेती जाओ …माँ तो माँ होती है
जब तक ना पहुची उस विधा के मन्दिर तक चैन ना था
जो सीखना था बाकी वो सीखा …
पता ही ना लगा ये दिन कब ढल गया …
अब तो कुछ ही दिन की बात है …
कुछ ही दिन ओर आना है मन्दिर मे
लेकर बस्ता चल दी आशियाने की ओर
उस तो इन्सानियत पता थी …
सबसे बड़ी सहेली भी थी …
उसने किया भरोशा अपनी सखी पे
सखी ही दगा दे गयी …
जो एक सपना थी खुद
एक रोशनी की किरन थी
सबकी जुबान थी आज
खुद ही बेजुबान होके रह गयी ……
जिंद्गगी ओर मौत के दरमियान
खुद आ गयी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरी प्यारी बहिना ………
भगत सिंह बेनीवाल
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